आज जब तीन ताल में आवाज़ पर बात हो रही है, तो मुझे भी अपने पुराने संस्थान का एक किस्सा याद आ गया।
बात उन दिनों की है, जब हमारे बॉस एरिया सेल्स की पोज़िशन पर कार्यरत थे। वे पूरे दिन गुटखा सेवन किया करते थे। जैसा कि ताऊ ने कहा है कुछ लोग आग लगने पर भी अपने 30 rupiya बर्बाद नहीं करते! 😄
हमारे बॉस भी बड़े किफायती स्वभाव के थे। जब हम लोग वीकली मीटिंग में होते थे, तो वे मुँह खोलने की बजाय इशारों में ही जवाब दिया करते थे। आखिर मुँह में ₹30 का बेशकीमती पान-पराग जो दबाए हुए होते थे! 😄
वे अक्सर “हूँ… हाँ… और हूँ… हूँ…” करके ही काम चला लेते थे। और अगर कभी मुँह खोलने की बहुत ज़रूरत पड़ जाए, तो बस एक शब्द—“Okay!” 😂
बस, इसी “Okay” में पूरी मीटिंग का सार, निष्कर्ष और एक्शन प्लान निकल आता था।
Aapka apna teen taliye
Sanjay door darshi
Delhi